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पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ बता आदिवासी किसान की ले ली जान, पीड़ित परिवार व गांव वालो ने हाईकोर्ट में लगाईं याचिका

पुलिस व सुरक्षा बलो पर लगा फर्जी मुठभेड़ का आरोप, घर से उठा कर जंगल की तरफ ले जा कर फर्जी मुठभेड़ कर मारा गया पोडियम भीमा को, पुलिस ने दिया  परिवार को जान से मारने की धमकी 


बस्तर:- भीमा के परिवार जन कहते है  हमने जब गांव वाले और  पत्रकारों से इस घटना के बारे में बात करी तो गांव व परिवार के लोगो को पुलिस ने बहुत धमकाया और उन्हें चुप्पी साधने  को कहा. भीमा की बहन कन्नी व पत्नी कोय्न्दे को जान से मारने की धमकी तक पुलिस के द्वारा दी गयी. घटना के दिन से  लेकर आज दिनांक तक पुलिस द्वारा भीमा के परिवार ,रिश्तेदार व गाव वालो  को लगातर पुलिस द्वारा पूछताछ व कही आने जाने पर रोक टोक लगातार हो रही है. जिसके कारान कोर्ट में याचिका लगाने में भी विलम्ब हुआ. पिछले एक महीने परिवार व  गाँव वाले पुलिस के आतंक में ज़िन्दगी गुज़र कर रहे है। 
                         विदित हो कि  मामला  बस्तर संभाग के पोलमपल्ली थाने के ग्राम पालामडगु, जिला सुकमा में सुरक्षा बल व पुलिस के हाथो फर्जी मुठभेड की घटना में एक आदिवासी किसान कि जान चली गई, इस घटना के शिकायत की अर्जी गांववालों ने बिलासपुर उच्च न्यायलय में दिनांक 24.10.2017 को माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में लगाईं है। 
       आप को बता दे कि बस्तर जहां फर्जी मुठभेड़ों की दांस्ता कोई नई नही है, सुरक्षा बलों के जवानों पर लगातार ग्रामीणों को नक्सली बता कर मारने के आरोप लगते आ रहे है, यही नही महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप भी लगते आ रहे है, आप को बता दे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब-तलब भी किया था। नक्सलवाद और सरकार के नक्सल उन्मुलन के बीच फंसे आदिवासी ग्रामीण लगातार मौत के घाट उतारे जा रहे है। जानकारों का यह भी कहना है कि बस्तर में आदिवासी ग्रामीण नक्सलियों से ज्यादा सरकार द्वारा नक्सल उन्मुलन में तैनात सुरक्षा बल के जवानों द्वारा फर्जी गिरफ्तारी, मुठभेड़, बलात्कार के शिकार हुए है। लांखो की संख्या में आदिवासी ग्रामीण पलायन के लिए मजबूर हुए है दूसरे राज्यो में जा कर बस गए है, यही कारण है कि आदिवासियों की संख्याओं में लगातार कमी देखी जा रही है।
PUCL ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बताया।
PUCL ने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बताता कि पोडियम भीमा, पिता- दूला, ग्राम- पालामडगू एक आम आदिवासी किसान था, जो अपने तीन बच्चो जिनमे से  एक 10 साल( लडका), दूसरा ७ साल( लड़का) और तीसरी  3 साल की लडकी  है. व  गर्भवती पत्नी के साथ निवास कर रहा था. घटना के दिन खेत से लौट कर वह अपनी दीदी के घर में आराम कर रहा था, तभी  रात को करीब 11-12 बजे पुलिस व सुरक्षा बल की एक फ़ोर्स उनके घर आई, और भीमा की आँखों को उसी के कमर पर बंधे तोलिये से बांधा और उसे चड्डी में ही ले गये. कई गांव वालों के सामने ले गए. भीमा बार बार चीखता रहा कि वह एक खेती किसानी करने वाला आम आदमी है, उसने क्या किया है, लेकिन पुलिस वालों ने उसकी एक ना सुनी और उसे अपने साथ ले गए. घटना की रात के बाद अगले दिन जब गांववाले भीमा को ढूँढने के लिए निकल रहे थे तो उनको जंगले की तरफ से कुछ गोलियों की आवाज़ सुनाई पड़ी. आवाज़ की तरफ जंगल में भागने पर वे एक स्थल पर पहुचे जहां पर बहुत सारा खून था. उन्होंने अनुमान लगाया की यह भीमा का खून है और उनको पुलिस व सुरक्षा बल वालों ने मार दिया है. 
जिसके बाद गाँव वाले जब पोलमपल्ली थाना गए शव को लेने के लिए गए, तो उन्हें पुलिस वालों ने थाने के अन्दर जाने नहीं दिया और उनसे कहा कि उनको ना ही किसी मुठभेड़ की और ना ही किसी शव की जानकारी  है. परंतु कुछ महिलाओं ने पुलिस वालो को भीमा के शव को एक पुलिस जीप में डालते हुए और शव को सुकमा की ओर ले जाते हुए देखा.  गाँव वालें भी उस तरफ चल दिए और दोरनापाल थाने पहुंचे तो वहाँ पर भी उनको पुलिस वाले उनके साथ बहुत ही बद्सलूकी  से पेश आये और उनको थाना के अन्दर आने नहीं दिया और शव के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से नकार दिया.
शव के लैंगिक अंग काटे गए।
गाँववाले हताश होकर पूरे दिन दोनों थाने के चक्कर काटते रहे जब अंत में रात को दोरनापाल थाने में उनको शव दिया गया. शव को गाँव ले जाकर गाँव वालों ने देखा की शव के लैंगिक अंग पूरी तरह से कटे हुए थे, और शरीर पर कई प्रकार की और भी चोटे आई हुई थी जिससे ऐसा साफ़ प्रतीत हो रहा था कि  भीमा को गोली मारने से पहले उसको काफी ज्यादा प्रताड़ित  किया गया था. शव को गाँव ले जाने के कुछ ही मिनट पश्चात ही भीमा की पत्नी के चौथे पुत्र का जन्म हुआ था.
परिवार वालों को दी जान से मारने की धमकी
गाँव वालों ने जब पत्रकारों से इस घटना के बारे में बात करी तो गाव व परिवार के लोगो को पुलिस ने बहुत धमकाया और उन्हें चुप्पी साधने  को कहा. भीमा की बहन कन्नी व पत्नी कोय्न्दे को जान से मारने की धमकी तक पुलिस के द्वारा दी गयी. घटना के दिन से  लेकर आज दिनांक तक पुलिस द्वारा भीमा के परिवार ,रिश्तेदार व गाव वालो  को लगातर पुलिस द्वारा पूछताछ व कही आने जाने पर रोक टोक लगातार हो रही है. जिसके कारान कोर्ट में याचिका लगाने में भी विलम्ब हुआ. पिछले एक महीने परिवार व  गाँव वाले पुलिस के आतंक में ज़िन्दगी गुज़र कर रहे है।
गांव की पहली घटना नही, नाबालिक लड़की को बलात्कार कर मारा भी गया।
2.1.2016 को दो नाबालिक लड़कियों के साथ सुरक्षा बल वालों ने बालात्कार करके उनको मार दिया था. गांववालों ने पत्रकारों व जांच दल से इस घटना के सम्बन्ध में बात-चीत करी थी लेकिन उनकी आवाज वही दबा दी गयी. सितम्बर 2016 में एक अन्य  पुरुष के उपर भी  सुरक्षा बल वालों ने गोली चलाई थी, जब वह तलाब से मछली निकाल रहा था. गोली उसके मस्तिष्क को छूकर चली गई और उसे काफी चोट आई थी. गाँव वालों ने घटना का खूब विरोध किया था और एक निष्पक्ष जांच की मांग राखी थी लेकिन आज दिनांक तक उस पर भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है।
उच्च न्यायलय के समक्ष न्याय की गुहार के लिए शरण।
गाँव वालों ने उच्च न्यायलय के समक्ष न्याय कि गुहार लगाईं है और यह भी मांग रखी है कि एक स्वतंत्र जांच इस मामले में हो. गांववालों ने न्यायालय से पुलिस के हाथों उनको लगातार तंग किये  जाने से राहत की उम्मीद की है और भीमा के बच्चे और पत्नी के लिए मुआवज़े व सम्पूर्ण रूप से सुरक्षा की मांग भी रखी  है.  लोक्स्वतान्त्र्य संगठन परिवार वालो के साथ है, व उनकी सभी मांगो का समर्थन करता है.
PUCLने कहा रमन सरकार मामले की संज्ञान ले।
        साथ राज्य की रमन सरकार से भी अनुरोध करता है कि इस मामले को संज्ञान में लेते हुए घर वालो को न्याय दिलवाए जाने में साथ दे. दोषी लोगो को सजा दे और सरकार के तरफ से भी मुआवजा दे. यदि सरकार ऐसा नही करती तो लोक्स्व्तंत्र संगठन, छत्तीसगढ़ के तरफ से आदिवासी के साथ लगातार हो रहे ऐसे उत्पीड़न के विरोध करता है और इसके लिए सभी कानूनी और ज़रूरी लोकतांत्रिक कार्यवाही करेगा .
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