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मैं आंय बस्तर जिला चो आदिवासी पिला... बस्तर के लोकगायक तिरुमाल लखेश्वर कुदराम का वो गीत जो बस्तर की असल पहचान बताती है


बस्तर का इतिहास: कोयतुर इतिहास को जानना पहचानना हो तो गोण्डी हल्बी भतरी लोकगीतों को पढ़िए विश्लेषण करो

बैला....डिला ... बैलाडिला......
मैं आंय बस्तर जिला चो आदिवासी पिला...

आया मचो दंतेसिरी बुआ भैरम आय
भाई डंडकार बहिन इंद्रावती ... सुंदर मचो
..... तुमके सरन सरन आय ...

मैं आय बस्तर जिला चो आदिवासी पिला...
मैं आंय बस्तर जिला चो आदिवासी पिला .....

बैला ... डिला .... बैलाडिला...
मैं आंय बस्तर जिला चो आदिवासी पिला...॥

इस हल्बी लोकगीत में बस्तर की कोयतुरीन सभ्यता संस्कृति की मूल छाप गीतकार दादा लखेश्वर कुदराम ने उकेर दी है।
अब चलते हैं अर्थ पर ...
बैला का डिला ही बैलाडिला है ... मैं हूं बस्तर क्षेत्र का आदिवासी बेटा ...मेरी मां दंतेश्वरी  (मावली) है बुआ( बाप भैरम( बुढ़ादेव/ डोकरादेव/ बुढ़ालपेन) है, भाई डंडकार (रावपेन /डाण्ड देव/ दण्ड राव/ गाँव की रक्षा करने वाला पेन) है और इंद्रवती मेरी बहन है। मैं हूं बस्तर जिला का आदिवासी बेटा ... बैला का डिला ही बैलाडिला है...

इस गीत का मूलभाव ही बस्तर के कोयतुर लोगों की मूल पहचान है जिसमें मावली याया, भैरम बाबा अर्थात् डोकरा देव, डंडकार मतलब रावपेन व इंद्रावती का कोयतुर से क्या रिश्ता नाता है वह बताया गया है । इसी रिश्ते नाते से वह आदिवासी स्वयं की पहचान बता रहा है। यह प्रत्येक कोयतुर गाँव अर्थात् बस्तर राज की प्रत्येक नार(गाँव)  की मूल संरचना को बताया है। दादा लखेश्वर कुदराम दादा को सेवा जोहार प्रकृति जोहार कि उसने कोया कोयतुर की मूल भाव पहचान जान को लोकप्रिय प्रख्यात लोकगीत में ढाल दिये ।

विश्लेषक
कोसो होड़ी उर्फ माखन लाल सोरी
लंकाकोट कोयामुरी दीप


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