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भू राजस्व संहिता में संशोधन का निर्णय आदिवासी, किसान विरोधी

आज विधानसभा में भू राजस्व संहिता में राज्य सरकार का संशोधन विधेयक पारित हो गया.इधर विपक्ष के आदिवासी विधायकों समेत समूचे विपक्ष ने भू राजस्व संहिता संशोधन विधेयक का विरोध किया.


छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने विधानसभा में आज एक और जन विरोधी निर्णय लेते हुए आदिवासियों से जमीन छीनने का रास्ता साफ किया हैं जिससे आसानी से अपने चहेते कार्पोरेट को जमीन उपलब्ध करवाया जा सके।छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता में संशोधन पूर्णतः आदिवासी विरोधी निर्णय हैं क्योंकि इससे आदिवासी की जमीनों को जबरन छीनने का रास्ता बनाया गया हैं।

यह संशोधन 2013 के केंद्रीय भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून, तथा पांचवी अनुसूची और पेसा कानून के प्रावधानों के विपरीत हैं, क्योंकि पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में बिना ग्रामसभा की सहमति के भूमि अधिग्रहण की प्राक्रिया संपादित नही की जाती परन्तु इस संशोधित प्रावधान से जमीन लेने पर ग्रामसभा की कोई जरूरत नही होगी। इसके साथ ही 2013 के कानून के मुख्य प्रावधान जिसमे सामाजिक समाघात अध्यन और पुनर्वास के प्रावधान से भी बचा जा सकेगा। इस संशोधन से एक सवाल यह भी खड़ा होता हैं कि जब पूर्व ही कलेक्टर की अनुमति से आदिवासी की जमीन खरीदने का प्रावधान विधमान हैं तो इस संशोधन की आवश्यकत्ता क्यो?




ज्ञात हो कि 2016 में राज्य सरकार ने आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति बनाई हैं जिसमे किसानों से सीधे जमीन खरीद की जा रही हैं यह प्रावधान भी इसी नीति के तहत आदिवासियों से जमीन खरीदनेे का मार्ग प्रशस्त करेगा। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन राज्य सरकार के इस आदिवासी किसान विरोधी निर्णय का पुरजोर तरीके से विरोध करते हुए इसे शीघ्र वापिस लेने की मांग करता हैं। प्रवधान के वापिस नही लिए जाने के स्थिति में व्यापक जनांदोलन के साथ इसे माननीय न्यायालय में भी चुनोती दी जाएगी।


नेता प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव ने कहा कि- आज यदि आदिवासियों की जमीन को लेकर कानून नहीं बना होता, तो उनकी जमीन बचती ही नहीं, लिहाजा इस कानून के संशोधन पर किसी तरह का विचार नही किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में कलेक्टरों की अनुमति से जमीन बेचने का अधिकार आदिवासियों के पास हैं. ऐसे में संशोधन लाने की सरकार की मंशा स्पष्ट नहीं है. विकास योजनाओं के नाम पर सरकार आदिवासी जमीन भी सहमति से ले सकती है. नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जल्दबाजी में यह संशोधन विधेयक नहीं लाया जाना चाहिए. उन्होंने इस संशोधन विधेयक को सलेक्ट कमेटी को सौंपे जाने की मांग की. टी एस सिंहदेव ने कहा कि- विधेयक के नए प्रावधानों को लेकर पुनर्विचार की जरूरत है. आदिवासियों की जमीनों को बेचने का खुला अधिकार सरकार को मिल जाये ये अनुचित है.
आदिवासी विधायक मोहन मरकाम ने कहा कि- पाँचवी अनुसूची के तहत आदिवासियों की जमीनों को संरक्षण मिलता है. नये संशोधन से असंतोष फैलेगा. उन्होंने कहा कि लोहंडीगुड़ा और नगरनार में आदिवासियों ने जमीन दिया था, लेकिन क्या हासिल हुआ. जमीन देने के बाद भी आदिवासियों को कोई फायदा नहीं हुआ. जनजातियों के हितों की रक्षा नहीं हो रही. उनकी जमीन हड़पी जा रही है.






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