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'विकास' और विकास की आड़ में आदिवासियों को ख़त्म करने की चल रही है गहरी साज़िश

सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष शैलेश टोप्पो जी लिखते है अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं क्योकि भ्रष्टाचारियों के साथ-साथ समस्त लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं ने भी तथाकथित विकास की उस अवधारणा को तहेदिल से स्वीकार कर लिया है! जहाँ विकासीय परियोजनाओं के आने से एक पक्ष में पैसों की बारिश तो दूसरे पक्ष में खड़े आदिवासियों का विनाश ही होना नजर आता है।

वर्ष 2017 के अंतिम दिवस 31 दिसम्बर 2017 दिन रविवार को सरगुजा जिला के एक गाँव में उनके आग्रह पर परामर्श बैठक के लिए "सर्व आदिवासी समाज" के प्रदेश उपाध्यक्ष व् जिला पदाधिकारियों को आमन्त्रित किया गया था। जहाँ लोगों ने बताया कि आने वाले छ: माह के भीतर हम 15 गाँव के समस्त आदिवासी लोग यहाँ से बेघर होने वाले है क्योकि सरकार और सरकारी विभाग क्षेत्र का विकास चाहती है।

मैंने पूछा कि भाई क्षेत्र में सरकार और सरकारी विभाग दोनों तो सबका विकास चाहती है तो आप क्यों बेघर हुए जा रहे है? तो उनका कहना था कि उनके गाँव में बाँध बन रही है जिसकी वजह से 15 गाँव के लोगों की पुरखौती जमीन डुबान क्षेत्र में है जिसके लिए प्रशासन ने कागज़ी कार्यवाही के नाम पर भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला देते हुए फर्जी ग्राम सभा कराकर उनकी पुरखौती भूमि के साथ-साथ समस्त गाँव की भूमि अधिग्रहित कर ली गयी है और मुआवजा न लेने वालों की राशन-दाना-पानी अप्रत्यक्ष रूप से बन्द करा दी गयी है जिसकी वजह से लोग मुआवजा लेकर भागने को मजबूर है।
ऐसी स्थिति में उनके जनप्रतीनिधियों ने भी उनको अब तक आश्वाशन के अलावा कुछ नहीं दिया है अब तो उनके नेताओं ने भी उन गाँव में सुध लेना छोड़ दिया है क्योकि अब इनके पास कोई निश्चित ठिकाना तो है नही इसलिए इनके मतदान से किसी को कोई लाभ नहीं दिख रहा है।
यह लेख उनके फेसबुक वाल से सभार है Shailesh Toppo
प्रदेश उपाध्यक्ष - सर्व आदिवासी समाज, (छ0ग0) भारत!
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