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बुमकाल दिवस : ‘अवैज्ञानिक प्रतिमाओं के झांसे में न आए कोयतूर समाज

यह मूल रूप से फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित हुआ है आप यहाँ विस्तार से पढ़ सकते है फारवर्ड प्रेस

बुमकाल आंदोलन के 108 वर्ष पूरे होने पर बस्तर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान स्थानीय आदिवासी नेताओं ने ब्राह्मणवादी मिथकों पर हमला किया। यह भी बात सामने आयी कि जिस शीतला माता को उत्तर भारत में देवी माना जाता है, असल में वह गोंड समुदाय की ग्रामदेवी हैं। बता रहे हैं तामेश्वर सिन्हा :


छत्तीसगढ के बस्तर में आयोजित बुमकाल[1] दिवस में दुर्गा पूजा के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता लोकेश सोरी ने मूर्ति पूजा का मुखर विरोध किया है। उन्होंने कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा अन्तर्गत देव स्थल उसेह मुदिया में गत 8 फरवरी, 2018 को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि क्या हमारी माताओं के छह हाथ हैं? हमारी माताओं के तो दो ही हाथ हैं। फिर छह हाथों वाली हमारी माता कैसे हो सकती है? लोकेश ने कहा कि यह बीमारी कहां से आयी है, इसकी पहचान करनी है। हमें याद रखना है कि हमारी माता तो तलूरमुत्ते  (धरती) हैं। इसके अलावा हमारी जो मातायें हैं उनके सिर्फ दो हाथ हैं। तलूरमुत्ते मां को हमारी किसी भी प्रकार की कार्य मे सबसे पहले पूजते हैं।[2] धान बोने से पहले और बाद में धान पकने के बाद भी जोहार करते हैं। गाँव की रक्षा करने वाली याया बरइ सेड़ो (गोंड परंपरा की ग्राम देवी)[3] हैं। यह गाँव की हर प्रकार से जतन करती है। लेकिन पढ़े लिखे अज्ञानी लोग इसे आजकल शीतला[4] कहने लगे हैं।

कौन हैं लोकेश सोरी?

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लोकप्रिय आदिवासी समाजिक कार्यकर्ता लोकेश सोरी थे। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुडे रहे लोकेश सोरी ने वर्ष 2017 में कांकेर में दुर्गा पूजा के आयोजकों पर आदिवासी पुरखा महिषाासुर का अपमान करने का विरोध करते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। बाद में भाजपा ने उन्हें पार्टी से बाहर निकाल दिया था। लोकेश इन दिनों अपनी जडों की ओर लौटते हुए आदिवासी समाज को अपनी संस्कृति के संबंध में जागृत कर रहे हैं।

छह-छह हाथों वाली मूर्तियां हमारी मातायें नहीं

लोकेश सोरी ने सभा को गोंडी भाषा में संबोधित करते हुए कहा कि सबसे बड़े जानकार हमारे घर में हमारे पुरखे हैं। परंतु आजकल बाहरी लोग असंवैधानिक रूप से रहकर कोयतुर समुदाय (छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड अादि इलाकों में रहने गोंड समुदाय व अनुसूचित जनजाति के अन्य समुदायों के लिए सामुहिक शब्द) को अवैज्ञानिक प्रतिमाओं की झांसे में खींच रहे हैं। इनके झांसे के कारण हम अपनी असली शक्ति मां-बाप की सेवा करना भूलकर उनके मां-बाप की पूजा-अर्चना में लग जाते हैं। वे मनुवादी लोग कोयतुर लोगों को बोलते हैं कि मूर्तियां हमारी मातायें हैं।

उनकी महिलायें देवी और हमारी मातायें बाई क्यों?

लोकेश ने कहा कि हमारे गांवों में ही हमारे मां-बाप हैं। फिर मनुवादियों के झांसे में क्यों जाते हैं? वहां हमारे लोगों के साथ कैसा व्यवहार होता है। हमारे महिलाओं को वो कैसे सम्बोधित करते हैं। जैसे चैतीबाई, बुधरीबाई, सुदरीबाई[5]। मतलब हमारी मातायें बाई हो गईं और उनकी महिलाएं देवी जैसे दुर्गा देवी, प्रभा देवी, शोभा देवी। लोकेश ने कहा कि षडयंत्र के तहत शातिर मनुवादियों ने हमारे लोगों में राम नाम को घुसा दिया है। जैसे बुधराम, दुखुराम, संतराम।


मनुवादियों की बीमारी का इलाज है संविधान में

लोकेश ने कहा कि यह सब अप्राकृतिक साजिश व्यवहार कोयतुर समुदाय के लिये बीमारी के समान है। इस बीमारी का इलाज करना है तो हमें हमारे मां-बाप की सेवा करते हुए संविधान के अनुच्छेद 13(3)क, 19(5), 244(1) व पारम्परिक ग्राम सभाओं की शक्तियों को पहचान कर जानना होगा। गौरतलब है कि अनुच्छेद 13(3) क में अनुसूचित जनजातियों के रूढिवादी प्रथाओं व परंपराओं को संरक्षित किये जाने संबंधी प्रावधान है। वहीं अनुच्छेद 19 में सामान्य तौर पर किसी भी भारतीय को देश की सीमा में कहीं बसने का अधिकार दिया गया है। परंतु इसके पांचवें उपबंध में कहा गया है कि अनुसूचित जनजातियों के इलाके में उनके हितों की रक्षा के लिए व बाहरी हस्तक्षेप को रोकने हेतु राज्य प्रावधान कर सकता है। जबकि अनुच्छेद 244(1) अनुसूचित जनजातियों के क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची का प्रावधान है जिसके तहत ऐसे इलाकों में स्थानीय सत्ता में स्थानीय आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित किया जाना है।

हमारे गांवों में न हो किसी बाहरी का हस्तक्षेप

लोकेश ने कहा कि जैसे इस गाँव का गायता[6] (गांव का धर्मप्रमुख) कलेक्टर से मिलने जाता है तब उसे भी सरकारी नियमों के तहत जाना पड़ता है। जैसे पहले कलेक्टर को पर्ची भेजा जाता है। वह अनुमति देते हैं और तब मिलते हैं। वैसे ही भारत का संविधान हमें अधिकार देता है कि यदि कोई बाहरी हमारे गांव में आये तो वह हमारी अनुमति से आये। लेकिन इसका अनुपालन नहीं किया जा रहा है। सरकारी पदाधिकारी संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। लाेकेश सोरी ने कहा कि संविधान का पालन करने का आदेश हमारी ग्राम-सभायें कर सकती हैं और उसे मानना सभी के लिए अनिवार्य होगा। ऐसा होगा तभी कोयतुर शान्तिपूर्वक रह सकते हैं और विकास कर सकते हैं।
इस मौके पर गोंडी भाषा के विशेषज्ञ शेर सिंह आंचला, परतापुर ग्रामसभा के मुखिया व आदिवासी समाज के नेता राजीव धुर्वा,आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सहदेव हुसेंडी और सुखरंजन उसेंडी सहित अनेक लोगों ने अपने विचार रखे।

बुमकाल का इतिहास

ग़ौरतलब है कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले बुमकाल गदर 1910 ईसवी में हुअा था। इसके नायक थे गुंडाधुर। अपनी पुस्तक ‘बस्तर : एक अध्ययन’ में डॉ. रामकुमार बेहार तथा निर्मला बेहार ने बताया है कि 25 जनवरी 1910 को यह तय हुआ कि विद्रोह करना है और 2 फरवरी 1910 को पुसपाल बाजार की लूट से विद्रोह आरंभ हो गया। इस प्रकार केवल आठ दिनों में गुण्डाधुर और उसके साथियों ने इतना बड़ा संघर्ष प्रारंभ कर के एक चमत्कार कर दिखलाया। 7 फरवरी 1910 को बस्तर के तत्कालीन राजा रुद्रप्रताप देव ने सेंट्रल प्राविंस के चीफ कमिश्नर को तार भेज कर विद्रोह प्रारंभ होने और तत्काल सहायता भेजने की माँग की। (स्टैण्डन की रिपोर्ट, 27 मार्च 1910)। विद्रोह इतना प्रबल था कि उसे दबाने के लिये सेंट्रल प्रोविंस के 200 सिपाही, मद्रास प्रेसिडेंसी के 150 सिपाही, पंजाब बटालियन के 170 सिपाही भेजे गये (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, 1911)। 16 फरवरी से 3 मई 1910 तक ये टुकड़ियाँ विद्रोह के दमन में लगी रहीं। करीब 75 दिनों तक बस्तर में आदिवासियों के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजी सिपाही लगे रहे। इस दौरान नेतानार के आसपास के 65 गाँवों से आये विद्रोहियों के शिविर को 26 फरवरी को सुबह में घेरा गया। 511 आदिवासी पकड़े गये जिन्हें बेंतों की सजा दी गयी (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, 1911)। नेतानार के पास स्थित अलनार के वन में हुए 26 मार्च के संघर्ष में 21 आदिवासी मारे गये। यहाँ आदिवासियों ने अंग्रेजी टुकड़ी पर इतने तीर चलाये कि सुबह चारों ओर तीर ही तीर नज़र आये (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, 1911)। अलनार की इस लड़ाई के दौरान ही आदिवासियों ने अपने जननायक गुण्डाधुर को युद्ध क्षेत्र से हटा दिया, जिससे वह जीवित रह सकें और भविष्य में पुन: विद्रोह का संगठन कर सकें। उल्लेखनीय है कि 1910 के विद्रोही नेताओं में गुण्डाधुर न तो मारे जा सके और न अंग्रेजों की पकड़ में आये।
बहरहाल, गुंडाधुर के नेतृत्व में हुए आंदोलन की स्मृति में 108वां बुमकाल दिवस पहली बार वृहत पैमाने पर पूरे बस्तर में मनाया गया। पहले इसका आयोजन छोटे स्तर पर होता था। इस कड़ी में एक वृहत आयोजन छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा अन्तर्गत देवस्थल उसेह मुदिया में ‘उसेह मुदिया राऊंड’ समिति के तत्वावधान में  8-10 फरवरी 2018 को किया गया। इस मौके पर 40 से अधिक गांवों के ग्रामीण एकत्रित हुए। ‘राऊंड समिति’ के इस कार्यक्रम के दौरान आदिवासियों के अधिकार, पांचवीं अनुसूची का सवाल, पेसा कानून, वन अधिकार कानून, रूढ़िवादी प्रथाओं को लेकर विचार विमर्श व प्रशिक्षण दिया गया। समारोह के दौरान सभी वक्ताओं ने गोंडी भाषा में अपने विचारों को रखा।

संदर्भ 

[1] बस्तर के स्थानीय आदिवासियों के मुताबिक मनुवादियों द्वारा बुमकाल आंदोलन को भूमकाल आंदोलन भी कहा जाता है।
[2] धरती पर जन्म लेने वाले पहले मानव
[3] आदिवासी विषयों की अध्येता चंद्रलेखा कंगाली के मुताबिक याया बरई सेडो का मतलब ‘बुढी बड़ी मां’ है।
[4] बिहार में गंगा के मैदानी भागों में शीतला माता की पूजा की जाती है।
[5] गोंडी भाषा में महिलाओं के नाम
[6] झारखंड के आदिम जनजाति असुर समुदाय में पुजार, पहान और बैंगा भी कहा जाता है

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