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आदिवासी एवं सर्व समाज सुमदाय का आयोजन कुपारलिंगों मुदिया का भव्य पेन कर्रसाड़ कल से शुरू


कांकेर/आमाबेड़ा। कुपारलिंगों मुदिया का भव्य पेन कर्रसाड़ का आयोजन दिनांक 29 मार्च से 31 मार्च तक आयोजन किया जा रहा है जो भारत के मूलनिवासियों की जीवन शैली पुनेम जो कि मोहन जोदड़ो हड़प्पा के पूर्व व्यवस्था पर चली आ रही नार्र व्यवस्था 14 पाड़, 18 बाजा (गीत संगीत), टोटम गोत्र, प्रकृति, अनुरूप पर्वो प्रकृति की आहट, पशु पक्षियों की आवाज तथा प्राचीन भाषाओं के रचनाकार पर्यावरण विद् गोटुल के संस्थापक व प्रचारक, पर्यावरण विद् रूपोलंग पहंदी पारी कुपार लिंगों जिनकी व्याख्या खगोलीय-9 खण्ड धरती 16 खण्ड पृथ्वी (ग्रहों) के ज्ञाता, गोंड़वाना भू-भाग में पुर्रूड़, पुकराल, स्पुराॅल आधारित बाना व बानी व्यवस्थापक, कोयतोरिंग के ज्ञानी, सामुदायिक व्यवस्था कौलश के अगुवा तथा भाईयों में सबसे छोटा रूपोलंग अनंत है । कचारगढ़, कहकवाह (महाराष्ट्र) आदिलाबाद, वारंगल, मेडारम उड़ीसा तथा मध्यप्रदेश आदि क्षेत्रों पर लिंगों की आस्था केन्द्रों में सबसे बड़ा लिंगों की बाना (आंगा) वल्लेकनार्र (सेमरगांव) परगना आमाबेड़ा वि.ख. अंतागढ़, उत्तर बस्तर कांकेर छत्तीसगढ़ में है। जिनके सम्बंध में संक्षिप्त जानकारी 1872 ई. की डाॅ. हिस्लप की अध्ययन से लिया जा सकता है । लिंगों ने स्पुराॅल (पंच तत्व) को भविष्य के लिए बनाये रखते हुए जीवन जीने की पुनेम व्यवस्था बनाई है। जो कि आज पारंपरिक रूप में हस्तांतरित होती जा रही है । वल्लेकनार्र में मौखिक हस्तानांतरण में बताई जाती है कि यहां ‘‘कर्रसाड़’’ मनाने की वर्ष नहीं बता सकते यहां अनंतकाल से मनाते आ रहे हैं पहले 12, 07 वर्ष में वर्षों के अतराल में लिंगो (बाजार) मेला होता था । अब हर तमीन साल के अंतराल में होता है । यहां पेन शक्तियों के अलावा लाखों मानव समुदाय इकट्ठा होते है यहां लिंगों की पेन रिश्तेदार, बुम मुदिया, उसेह मुदिया, होचे मुदिया, पटवेंज मुदिया, मुट-खण्डा मुदिया, परमाह मुदिया, पोड़्द गुमा मुदिया, कानाहुर्राल, कुरसे बुढ़ाल, कड़का बुढ़ाल, हमुल बुढ़ाल इन पेन कड़ा, मंडाओं के अलावा अन्य स्थानों से भारी मात्रा में 40 हजार से अधिक देवी देवता, आंगा, डोली, लाट, छत्तर, गुटे देवी एवं अन्य बानाओं को लाया जाता है ।
यहां विदेशी शैलानियों के अलावा तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार, कनार्टक एवं ओड़िशा से पेन पुनेमी तथा शोधकर्ता आते है । यहां सुदूर वनांचल में प्रकृति की विहंग गोद में विश्व प्रसिद्ध भव्य कार्यक्रम होता है यहां मुख्य रूप से 12 भाई (श्रम सहकार) नेंग दस्तूर करते हैं, जो हजारों सालों की परंपरा से चली आ रही है । यहां की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ निर्देशों का पालन करना आवश्यक होता है । इसके पहले 2003, 2006, 2010 एवं 2014 इन्हीं अंतरों में हजारों वर्षों की कई पीढ़ियों से होती चली आ रही है । इस वर्ष 29, 30, 31 मार्च 2018 को आयोजित है । वल्लेकनार्र (सेमरगांव) यहां आने हेतु मुख्य रूप से तीन मार्ग है राष्ट्रीय राजमार्ग रायपुर-जगदलपुर की केशकाल बेड़मा से 45 कि.मी., कांकेर से स्वयं की वाहन से 42 कि.मी. तथा मुख्यालय अंतागढ़ से 18 कि.मी. यहां से पहुंचा जा सकता है। इस देवी मेला में शामिल होने के लिए शैलानी अपना अपना खाद्य सामग्री एवं सोने संबंधित व्यवस्था बनाकर आवे एवं इस मेले प्रागंण में राजनीति दलों का बेनर, पोस्टर, फ्लेक्स पर लिंगों ट्रस्ट समिति के द्वारा प्रतिबंधित है । लिंगों बाबा का फोटो ग्राफी एवं विडियो ग्राफी ट्रस्ट समिति के द्वारा प्रतिबंधित है। उक्त जानकारी सुगदू पटावी एवं लक्खू सर्फे सरपंच ग्राम पंचायत बड़ेतेवड़ा के द्वारा प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से दी गई । 
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