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25 वर्षों के बाद भी सामान्य क्षेत्र की ग्रामसभा व अनुसूचित क्षेत्र की पेसा ग्रामसभाओं की स्वायत्तता व स्वशासन का उद्देश्य फलीभूत नहीं हुआ।


रायपुर (छत्तीसगढ़)। आज ही के दिन पंचायती राज अधिनियम को लागू किया गया था । 24 अप्रैल 1993 के दिन ही संसद द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 243(क) के तहत 73वां संविधान संशोधन कर पंचायती राज अधिनियम की स्थापना की गई। परम्परागत पंचायत राज व्यवस्था मूल रूप से आदिवासी समुदाय में हजारों वर्षों से चली आ रही लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इस व्यवस्था में लोकतंत्र के तीनों आधार स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के परंपरागत ढांचे होते हैं जो आज भी कायम हैं। पंचायती राज अधिनियम 1993 की व्यवस्था के अनुसार ग्रामसभा को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। इसलिए इस दिन को ग्राम स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाता है।
"भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी बहुल आबादी है, जो प्राचीन रीति-रिवाजों और प्रथाओं की एक सुव्यवस्थित प्रणाली के माध्यम से अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करती है और अपने निवास स्थान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को संचालित करती है। इस अभूतपूर्व सामाजिक परिवर्तन के युग में, इस चुनौती का सामना करने के लिए आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक-आर्थिक परिवेश को छेड़े या नष्ट किए बिना उन्हें विकास के प्रयासों की मुख्य धारा में शामिल करने एक और काम हुआ। इसके तहत भूरिया की अध्यक्षता में गठित कमेटी के द्वारा 73वें संसोधन में "24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान पंचायती राज अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार पेसा (1996) भारत के संविधान के नौवें भाग में शामिल किया गया । जहां अनुसूचित क्षेत्रों की पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा प्रदान करता है ।"
"गांव के बारे में कोई राज्य विधान जो बनाया जाय, रूढ़िजन्य विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की परंपरागत प्रबन्ध पद्धतियों के अनुरूप होगा। यह ग्राम साधारणतया आवास या आवासों के समूह अथवा पुरवा या पूर्वजों के समूह से मिलकर बनेगा जिसमें समुदाय समाविष्ट हो और जो परम्पराओं के अनुसार अपने कार्यकलापों का प्रबंध करता हो। इसका केंद्रीय नियंत्रण ग्रामसभा के द्वारा ही होगा ग्रामसभा को एकाधिकार व शक्तियां प्राप्त हैं। इसमें अनुसूचित क्षेत्रों के विकास परियोजनाओं के लिये भूमि अर्जन, लघु जल निकायों के योजना प्रबंधन, गौण खनिज के लिए सर्वे, लीज या खनन पट्टा की स्वीकृति व लीज निरस्त करना, मद्य निषेध व नियंत्रण, गौण खनिज के स्वामित्व का निर्धारण, भूमि के अन्य संक्रमण को निवारित करने और किसी अनुसूचित जनजाति की विधिविरुद्ध अन्य संक्रमित भूमि को प्रत्यावर्तित करने के लिए उपयुक्त कार्यवाही करने की शक्ति शामिल है। गाँव बाजारों का चाहे वो किसी भी नाम से ज्ञात हो का प्रबंधन करने की शक्ति, साहूकारी पर नियंत्रण, सभी सामाजिक क्षेत्रों एवं संस्थाओं और कार्यों पर नियंत्रण की शक्ति, सभी स्थानीय योजनाओं पर और ऐसी योजनाओं के लिए जिनके अंतर्गत जनजातीय उपयोजनायें हैं संसाधनों पर नियंत्रण रखने की शक्तियां प्राप्त हैं।"
उपरोक्त किसी भी गाँव की सम्पूर्ण शासन व नियंत्रण की शक्तियों का दमन राज्य सरकार व जिला प्रशासन के द्वारा ही किया जा रहा है। नगरनार प्लांट, टाटा स्टील प्लांट लोहंडीगुड़ा, रायगढ़, जशपुर, सरगुजा, धमतरी, बैलाडीला का खनिज उत्खनन व भूमि अधिग्रहण हेतु खुल्लमखुल्ला उलंघन किया गया है। आज भी ग्रामसभाओं में सभा की गरिमा के अनुरूप आयोजन ही नहीं हो रहा है। गरिमापूर्ण ग्रामसभा बैठक में सभापति ही सर्वोच्च होता है लेकिन यहां तो उलट हो रहा है सरपंच व सचिव सर्वोच्च बने रहते हैं और उसमें सभापति व सदस्यों की कोई सुनवाई नही होती जिसके कारण गांव की विकास, योजना, नियंत्रण, अनुमोदन नियमानुसार नहीं हो रहे हैं इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों के ग्राम पंचायत में शौचालय, नरेगा, योजनाओं के आवंटन में घोटाले सरपंच सचिव के द्वारा किया जाता है। गौण खनिज की रायल्टी में बंदरबांट व नियम विरुद्ध लीज दी जाती है। इन सबका प्रमुख कारण ग्रामवासियों को ग्रामसभा की शक्तियों व अधिकारों की जानकारी प्रशासन द्वारा नहीं दिया जाना है। जब ग्रामसभा के सदस्य जागरूक होंगे तब उस गाँव में विकास को कोई नहीं रोक सकता। अनुसूचित क्षेत्र के संवैधानिक अनुच्छेद 19(5),19(6),243(क),243(zc),275,  ग्रामसभा की अधिकार शक्तियों का जिला प्रशासन व राज्य सरकारों द्वारा अनुपालन नहीं करने के कारण ही इन क्षेत्रों का विकास 68 वर्षों बाद भी नहीं हुआ।
25 वर्षों के बाद भी सामान्य क्षेत्र की ग्रामसभा व अनुसूचित क्षेत्र की पेसा ग्रामसभाओं की स्वायत्तता व स्वशासन का उद्देश्य फलीभूत नहीं हुआ। ग्रामसभाओं के निर्णय आदेश प्रस्ताव से ही होकर गाँव की सभी विकास योजना, जमीन उपयोग, सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों के चयन व सामुदायिक वन, भूमि, संसाधन ,बाजार नियंत्रण का आदिवासी जीवन दर्शन की केंद्रीय भूमिका में परंपरागत कस्टमरी लॉ के तहत संचालन करना ही इस स्वशासन का मूल आधार है। परंतु प्रशासन के द्वारा पेसा कानून व पंचायती राज अधिनियम तथा ग्रामसभा की लगातार उपेक्षा कर अवहेलना की जाती रही है जो चिंतनीय है। इसलिए केंद्र या राज्य सरकार की ग्राम विकास की योजनाएं जमीनी स्तर पर सफल नहीं हो पा रही हैं। 
छतीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं :भारत की केंद्रीयकृत व्यवस्था में 1980 दशक के अंतिम वर्षों में स्थानीय स्वशासन की दिशा में एक नई सोच का प्रादुर्भाव त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के रुप में हुआ। वर्ष 1986 में स्वर्गीय ब्रह्मदेव शर्मा जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी का इस ओर ध्यान आकर्षित किया कि आदिवासियों की स्वशासन की अपनी परंपरागत व्यवस्था है जो बहुत ही सशक्त और प्रभावी है । अतः इसके ऊपर अन्य कोई व्यवस्था नहीं थोपी जानी चाहिए । अतः आदिवासी इलाकों को बाहर रखते हुए 1992 में संविधान के 73 वें संशोधन के साथ पंचायती राज व्यवस्था को लागू करते हुए संविधान में सर्वप्रथम ग्रामसभा को शामिल किया गया। सामान्य क्षेत्रों की पंचायत व्यवस्था के प्रावधानों को अपवाद और परिवर्तन के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में लागू करने के लिए सुझाव हेतु गठित भूरिया कमेटी की सिफारिशों के तहत 1996 में पेसा कानून पारित कर उसे अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू किया गया। इस कानून की खासियत थी कि समाज, परंपरा और रूढ़ि के लिए स्थान बनाते हुए ग्रामसभा के रूप में गांव समाज के नैसर्गिक अधिकार को मान्यता दी गई। डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा मानते थे कि गांव एक स्व निर्मित सत्ता है। 
अनुसूचित क्षेत्रों की परंपरागत ग्राम सभाओं के आदेश और निर्णय प्रस्तावों को वहां का प्रशासन व मीडिया विरोध बता देता है जबकि वह विरोध नहीं बल्कि जनादेश होता है। इस बात को माननीय उच्चतम न्यायालय ने समता के फैसले में 1997 में साफ कहा है कि अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकार या गैर आदिवासी किसी शख्स की एक इंच भी जमीन नहीं है। इसलिए इन क्षेत्रों में लोकसभा ना विधानसभा सबसे ऊंची पारंपरिक ग्रामसभा (वेदांता का फ़ैसला 2013) से ज्यादा किसी की अधिकार नहीं है। इसलिए इन क्षेत्रों में कोई भी जमीन अधिग्रहण निर्माण परियोजना नई योजना लागू करने से पहले पारंपरिक ग्राम सभा की अनुमति आदेश अनिवार्य होता है परंतु जिला प्रशासन संविधान के विरुद्ध इन क्षेत्रों में जनादेश के आदेश को हमेशा कुचलने के तमाम उदाहरण पेश करता रहा है जो इन क्षेत्रों का विकास न हो पाने तथा अशांति की मुख्य वजह है।
पेसा कानून लाने का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करना और सार्वजनिक संसधानों पर बेहतर नियंत्रण तथा प्रत्यक्ष सहभागिता तय करना था। जिसकी जमीन उसका खनिज इसका मूल उद्देश्य था इनका नारा था मावा नाटे,मावा राज। आदिवासियों की लम्बी लड़ाई के बाद 73 वें संविधान संशोधन में पेसा कानून को सम्मिलित किया गया।
सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के प्रांत अध्यक्ष विनोद नागवंशी कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि होता है संवैधानिक व्यवस्था के तहत पंचायती राज की स्थापना की गई और पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पेसा कानून का प्रावधान किया गया, यह सोच कर पेसा एक्ट बनाया बनाया गया था की आदिवासी अपने अनुसूचित क्षेत्र में गांव गणराज्य की स्थापना कर सकें। साथ ही ग्राम सभा के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करते हुए विकास कर सकें। परंतु इतने वर्षों बाद भी आदिवासी समाज का नेतृत्व राजनीतिक स्तर पर कहीं दिखता नहीं। साथ ही ग्राम सभा में भी पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में लगातार संवैधानिक अधिकारों का अवहेलना हो रहा है।
चाहे सुप्रीम कोर्ट का निर्देश हो या समता जजमेंट हो या 13 (3)का, 244( 1 )किसी के आदेश का पालन नहीं हो रहा है । सभी स्तरों पर आदिवासियों का शोषण लगातार शासन के माध्यम से किया जा रहा है। आजादी के पूर्व से संस्कृति और प्राकृतिक संपदा के साथ ही अकूत खनिज संपदा के वंशज के रूप में यह समाज आज भी हेय दृष्टि से देखा जाता है। और इनके विकास की योजनाओं को राज्य और केंद्र बनाने का दावा तो करते हैं परंतु धरातल में कुछ और ही दिखता है। आज भी जीविकोपार्जन की स्थिति को मजबूत करने के बजाए बेमतलब की चीज बांट कर उन्हें कमजोर और गरीब  बनाने के लिए शासन लगा हुआ है ।
बहरहाल सत्ता के विकेंद्रीकरण के साथ स्थानीय स्वशासन की दिशा में ग्रामसभा के अधिकारों का पालन करने में सरकारों ने कभी रुचि नहीं दिखाई। अपनी कारपोरेट परस्त नीतियों के कारण अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारों ने सभी गैरकानूनी कार्यों को अंजाम देते हुए प्राकृतिक संसाधनों की लूट को ही आगे बढ़ाया है। संविधान की पांचवीं अनुसूची की मूल भावना के अनुरूप अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए पेसा कानून ने ग्रामसभा को शक्ति सम्पन्न बनाया है। और उन्हें निर्णय का पूरा अधिकार है। परंतु इतने वर्षों के बाद जब हम इस संवैधानिक व्यवस्था की यथार्थता को देखते हैं तो पाते हैं कि स्वशासन की आदर्श इकाई ग्रामसभा को सिर्फ प्रस्ताव पारित करावाने तक ही सीमित कर दिया गया है। कंपनियों के लिए जमीन हड़पने के लिए पूरा प्रशानिक तंत्र शाम-दाम-दंड भेद की नीति अपनाता है। इसके उदारहण हमें बस्तर में टाटा एस्सार के लिए सरगुजा में अडानी के लिए या रायगढ़ में जिंदल के लिए और कोरबा में एससीएल के लिए अधिग्रहीत जमीनों में ग्रामसभा के प्रावधानों का मख़ौल उड़ाते हुए दिखे हैं। 
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को सिर्फ एक सरकार की क्रियान्वयन एजेंसी बना कर रख दिया गया हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो हालात और भी बुरे हैं। प्रशासनिक अधिकारी ग्रामसभा के निर्णय को मनाने की जगह उस पर गैरकानूनी निर्णय थोप रहे हैं। आज इतने वर्षों बाद विशेषरूप से आदिवासी समाज में पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के प्रति एक चेतना का विकास हुआ है और व शांतिपूर्वक लोकतांत्रिक तरीकों से अपने संघर्षों को आगे बढ़ाकर अपनी परंपरागत सामुदायिक व्यवस्था के आधार पर स्थानीय स्वशासन को लागू करेंगे।
( यह मूल रूप से जन चौक में पब्लिश हुआ है आप जन चौक में पढ़ सकते है )
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