Header Ads

"मेरा आदिवासी होना ही काफी है मेरी हत्या के लिए"

मेरा आदिवासी होना ही काफी है मेरी हत्या के लिए.
नक्सली व मुखबीर होना तो बस बहाना है।

मेरी माटी पर है नजर तुम्हारी
विकास व समसरता तो बस फसाना है।

छिन लेना चाहते हैं सारी सम्पदाएं मुझसे.
जो प्रकृति ने मुझे दिया प्यार से.

मैनें सरंक्षण किया सबका
पर अब लुटना चाहते हैं व्यापार से।

गहरी है इतिहास मेरी ,  अलिखित  मेरा संविधान था,
था प्रकृति प्रेम का अद्भुत मिश्रण,  गोंडवाना की  माटी भी महान था।

पर लुट लिया तुम सबने ,  मेरी सारी सम्पदायें.,
किया प्रकृति के नियमों से खिलवाड तो आएंगी आपदायें।।


मानव सभ्यता के विकास में या हर क्रांति के आगाज में
प्रकृति के संरक्षण में , हर पहला कदम मेरा था।

मैनें नदियों संग जीना सीखा,  पेडों के साथ बढना सीखा।
पंक्षियों संग बोलना सीखा , पशुओं संग चलना सीखा।

मैं जंगलों में रहकर उसी के रूप में ढलने लगा
प्रकृति के आंचल में मुस्कुरा कर पलने लगा।

पर उनकी क्रूर नजर से बंच नही पाया
मेरी माटी मेरी वन साथ रख न पाया।

चन्द कौडी के लालच में लूट गयी मेरी माटी और वन,
छोंड अपनी मातृभुमि किया मेरा विस्थापन।

अब दर दर भटक रहा रोजी , रोटी और मकान के लिए
मेरा आदिवासी होना ही काफी है मेरी पहचान के लिए।

सोनू रुद्र मांडवी अम्बिकापुर जिले के सूरजपुर से है , और आदिवासी युवा लेखक है । 
Powered by Blogger.