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सड़कें तमाम बन गयीं जंगल को रौंद कर .. अब इस तरक़्क़ी के बीच एक पौधा लगाया नही जाता ...चित्रा




कल फिर से देखा है मैंने अख़बारों में किसी भूखे को मरते हुए..
के अब मुझसे भी ये निवाला खाया नहीं जाता ....



टूटे हुए दिलों से निकला करती है शायरी...

वस्ल वालों से इस तरह गाया नहीं जाता...

आज फैक्ट्रियों के नाम पर लुट गयी ज़मीन रोटी उगाने वालों की....
क़िताबों में तो पढ़ा था खेतिहर ज़मीन पर कारख़ानों को बनाया नहीं जाता ...???







हर तरफ मज़हबों की बातें होती हैं तेरे शहर में ..

अब इस इकलौते इंसान से यहाँ जिया नहीं जाता ..





वो खुदा है.. नहीं नहीं वो भगवान् है.. वो मेरा भगवा . वो मेरा परचम सब से ऊंचा है...

इस भड़कती आग को अब बुझाया नहीं जाता .....



तेरे पहलु में तेरा हमसफर आज है .. ठीक है न !

इस तरह सामने आ- आ कर माज़ी को तड़पाया नहीं जाता ....



आज फिर भूखे पेट आ गई है नींद ... ईंटों पर .....
नींद से भी अब उस बच्चे को सताया नहीं जाता ....

जिसे तुम बाजार की रौनक कहते हो...
वो जिस्म बेंच कर भी दिल में ईमान क़ायम रखे हुए है...
और सफ़ेद पोशों को देख लो... इनसे एक वादा निभाया नहीं जाता ..

अब भी पुराने पीपल के दरख्त में परिंदे रहते तो हैं मगर ..
बाबा - दादी के इंतक़ाल के बाद गांव वाले घर में जाय नहीं जाता ...

वो बुज़ुर्ग हो चुकी माँ है.. उसकी सरपरस्ती ही बहुत है..
सुना है कि माँ की दवाओं का एक लफ्ज़ भी ज़ाया नहीं जाता ..

लो छिन गया है उन बूढ़े कांधों का सहारा भी सरहद पर ..
इन हुक्मरानों को क्या पता ... किसी का सुहाग इस तरह मिटाया नहीं जाता ..

आबाद गांवों को उजाड़ कर ... बना दिए स्टेडियम तुमने ...
पर नए घरौंदों को तुमसे बसाया नहीं जाता ....

क्या - क्या लिखूं क्या - क्या कहूं ...
कटने मसाइल हैं मुल्क़ में ... एक मुझसे सबकुछ सुनाया नहीं जाता .




(रोशनी बंजारे "चित्रा "')
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