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नक्सली बताकर मासूमों की इज्ज़त को करते हैं तार तार, एक ओर मानवता कराहती है,तो दूसरी ओर इंसानियत होती है शर्मसार : रीना गोटे




आदिवासी युवती रीना गोटे का एक और कविता प्रस्तुत कर रहे है, रीना गोटे कहती है "क्या अपना हक मांगने वाला आदिवासी ही नक्सलवाद का पर्याय है? आदिवासी, जिसने प्रकृति की गोद में जन्म लिया,जंगलों, पहाड़ों, कंदराओ, गुफाओं में रहना सीखा, उसने प्रकृति की सेवा किया। मांदर की थाप और रेला की धुन, पंछियों का कलरव और भंवरों का गुनगुन, इनके जीवन का हिस्सा रहा यही हैं वे आदिवासी,अनंत काल से पृथ्वी के मूलनिवासी। आज प्रकृति के संरक्षण के लिए लड़ रहा है, ये सत्ताधारी अपनी रक्तरंजित षड्यंत्र में इन्हें जकड़ रहा है" पढ़िए उनकी कविता




आखिर कौन है असली नक्सलवादी ?
अरे ! नक्सलवाद तो एक बहाना है,
तुम्हें विकास के लिए चाहिए इनका खजाना है।” 


सत्ता की चादर आदिवासी जमीन पर फैलाते हो,
और छल कपट से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को लाते हो।

जमीनों को हड़प गांवो बस्तियों को जलाते हो,
और स्वयं को "विकास का भगवान" बतलाते हो।

कैसे सहे कोई इस भ्रष्टाचार से हुई बर्बादी को,
ये भ्रष्ट नीति ही जन्म देती है किसी नक्सलवादी को। 

तैनात करते हो फिर इनके समक्ष कोई सुरक्षा बल,
जो भक्षक बनकर स्त्री की देह लूट रहे हैं पल पल।
नक्सली बताकर मासूमों की इज्ज़त को करते हैं तार तार,
एक ओर मानवता कराहती है,
तो दूसरी ओर इंसानियत होती है शर्मसार। 

जब स्त्री के स्तनों को निचोड़कर मातृत्व का परिचय देना पड़ता है,
तब कहाँ था तुम्हारा कानून जो नारी विमर्श की बातें करता है। 

सर पर लकड़ियों लिए सड़को पर चलते थे महिलाएं - सियान,
आज खौफ के मंजर से वही सड़कें हैं वीरान,
ऐसे ही मारकर और आपस में लड़ाकर करना चाहते हैं मूलवासियों का पतन,
फिर इनकी जमीनों पर कब्जा कर निर्मित कर लेंगे कल कारखानें और भवन। 

छीन रही है धीरे धीरे प्रकृति रूपी ये परछाई,
जंगल, गांव, खेत खलिहानों में छा रही तन्हाई,
अब स्वयं लड़ना होगा अपने हक के लिए,
"उलगुलान" की लेनी है अँगड़ाई।

अब हमें यह समझना है कि कौन रोटी बेल रहा है और कौन रोटी से खेल रहा है?
अपनी जमीन, बस्तियों को उजाड़कर नहीं करने देंगें विकास,
भारत का असली मालिक नहीं बनेगा उनका दास।

असफल करना है सत्ताधारियों का षड्यंत्रकारी प्रयास,
क्रांति, विद्रोह और संघर्ष इसी से बदलेगा अपना इतिहास।
इसी क्रांति के मशाल को फिर से जगाना है,
बिरसा के "मावा नाटे मावा राज " को लाना है। 

वरना निरर्थक हो जाएगा क्रांतिकारियों का वह बलिदान,
जिन्होंने इस जमीन के लिए खो दिए अपने प्राण। 


हुंकार भरो चुप्पी तोड़ो और यलगार करो।
ऐ वीर नारायण बिरसा के वंशज अत्याचार की बेड़ियों से स्वयं को आजाद करो.... स्वयं को आजाद करो...



रीना गोटे शा. काकतीय पी जी कॉलेज जगदलपुर में व्याख्याता के पद पर कार्यरत है । आदिवासी युवा कवयित्री है । छत्तीसगढ़ भिलाई में निवासरत है ।
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