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आदिवासियों की छाती पर चढ़कर सदियों से किया अत्याचार है..



आदिवासियों की छाती पर चढ़कर
सदियों से किया अत्याचार है
लूट मची है जोरो से 
विकास दरकिनार है
भ्रष्टाचार करने की होड़ मची
इंसानियत नागवार है
लूट मची है जोरो से
विकास दरकिनार है
जूता बांटकर लोगो में
कैंसर का बिछाया जाल है
आदिवासियों की लाशों पर
ये कर रहे व्यापार हैं
इन फ़र्जी मुठभेड़ों का
कौन जिम्मेदार है
लूट मची है ज़ोरो से
विकास दरकिनार है
लूटी गयी है अस्मते
छीनी गयी जमीन भी
हर वक्त होता शोषण यहाँ
आदिवासियों को किया लाचार है
रोज हो रहा विस्थापन
सुने पड़े हैं गांव भी
देखकर हालात बस्तर की
मानवता शर्मसार है
जो हक़ की बात अगर करे
वही गुनाहगार है
अघोषित आपातकाल है
ये अघोषित आपातकाल है
लूट मची है ज़ोरो से 
विकास दरकिनार है।

लेखक- मनीष धुर्वे, युवा कवि है।
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